संघ प्रचारक विनोद कुमार की वसीयत में लिखा था कि जहां निधन हो, वहीं अंतिम संस्कार हो। जानें महाकुंभ से जुड़ा पूरा मामला।

उज्जैन में निधन के बाद विनोद कुमार का अंतिम संस्कार वहीं क्यों हो रहा है, और इसके पीछे क्या फैसला था? इसका जवाब उनकी वसीयत में मिलता है। संघ के 75 वर्षीय वरिष्ठ प्रचारक लंबे समय से बीमार थे और उनकी चाह महाकाल की नगरी में रहने की थी। उनके जाने से संघ परिवार, समाज और राजनीति में शोक है।
पिछले साल प्रयागराज महाकुंभ में उन्होंने शैया दान किया था और उसी समय वसीयत बनवाई। वसीयत में इच्छा जताई गई थी कि जहां निधन हो, वहीं अंतिम संस्कार की व्यवस्था हो। बुधवार सुबह उज्जैन के चक्रतीर्थ पर होने वाला संस्कार इसी वजह से तय हुआ है।
परिवार का कहना है कि बीमारी में भी विनोद कुमार का अनुशासन टूटा नहीं। वे रोज तड़के करीब चार बजे महाकाल के दर्शन और नामजप से दिन शुरू करते थे।
संघ में भी उनकी जिम्मेदारियां लंबी रहीं। वे अखिल भारतीय कार्यकारिणी के आमंत्रित सदस्य थे और पहले मध्य क्षेत्र के क्षेत्र प्रचारक व अखिल भारतीय सह प्रचारक प्रमुख रह चुके थे।
जानकारी के अनुसार, वे बागपत के बामनौली गांव में काशीराम और शकुंतला देवी के परिवार में जन्मे। मेरठ के इंद्रा नगर में बचपन बीता, जहां उन्हें ‘गांधी’ नाम से बुलाया जाता था। मोदीनगर में प्रारंभिक शिक्षा और फिर स्नातकोत्तर के बाद संघ कार्य ही उनके जीवन का केंद्र बन गया।
उत्तराखंड के हल्द्वानी, उत्तर प्रदेश के फिरोजाबाद और कई अन्य क्षेत्रों में उन्होंने संगठन के विस्तार का काम किया। दशकों तक संघ की विचारधारा और गतिविधियों से जुड़े रहे। संघ परिवार उनके निधन को बड़ी क्षति मानता है।
उज्जैन के आराधना भवन में डॉ. मोहन यादव ने पार्थिव शरीर पर पुष्पचक्र रखकर श्रद्धांजलि दी। फिर अंतिम यात्रा में चलते हुए उन्होंने अर्थी को कंधा दिया और भावुक विदाई दी।



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