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2029 लोकसभा चुनाव में 38 करोड़ Gen-Z वोटर चुनावी तस्वीर बदल सकते हैं। भाजपा, कांग्रेस और क्षेत्रीय दल युवाओं को साधने में जुटे हैं।
नई दिल्ली। 2029 के लोकसभा चुनाव में सबसे ज्यादा चर्चा अगर किसी वर्ग की होने वाली है तो वह Gen-Z वोटरों की ही, जैसे कि लोग बोल रहे हैं… अनुमान के मुताबिक 18 से 32 साल की उम्र के करीब 38 करोड़ युवा तब मतदान के योग्य होंगे , मतलब हर चार वोटरों में लगभग एक वोट इसी पीढ़ी का। यही कारण है कि भाजपा, कांग्रेस और कई क्षेत्रीय दल अभी से युवाओं तक अपनी बात पहुंचाने के लिए नई-नई रणनीतियां गढ़ रहे हैं, कुछ हद तक जल्दी ही सही।
अब राजनीतिक दल सिर्फ जनसभाओं और बड़े-बड़े भाषणों के भरोसे नहीं बैठे हैं। सोशल मीडिया, शॉर्ट वीडियो, पॉडकास्ट, मीम्स और इन्फ्लुएंसर्स के जरिए युवाओं से जुड़ने की कोशिश लगातार बढ़ती जा रही है। इसके साथ ही छात्र संगठनों और युवा संवाद कार्यक्रमों के जरिये, सीधे बातचीत वाला माहौल भी बनाया जा रहा है , ताकि दूरी कम लगे।
Gen-Z के लिए चुनावी बहस सिर्फ पुराने ढर्रे के राजनीतिक मुद्दों तक सिमटी नहीं है। रोजगार, शिक्षा, भर्ती परीक्षाओं में पारदर्शिता, पेपर लीक, स्टार्टअप, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और डिजिटल करियर जैसी बातें उनके लिए ज्यादा अहम बन रही हैं। और इसी वजह से राजनीतिक दलों को सिर्फ घोषणाएं फेंकने के बजाय यह साफ़ करना होगा कि उन पर अमल कैसे होगा और युवाओं को फायदा आखिर कब मिलेगा , सच में।
यूएन वर्ल्ड पॉपुलेशन प्रॉस्पेक्ट्स 2024 के 2029 के अनुमान के मुताबिक उस समय भारत की आबादी करीब 151.3 करोड़ हो सकती है। इनमें 18 से 32 साल की उम्र वाले करीब 38 करोड़ लोग Gen-Z वर्ग में होंगे, जो कुल आबादी का लगभग 25.1 प्रतिशत है। इसका मतलब है कि 2029 के चुनाव में हर चार वोटरों में से करीब एक वोट इसी पीढ़ी का हो सकता है। वहीं 0 से 17 साल के Gen Alpha और Gen Beta की आबादी करीब 41.7 करोड़ यानी 27.6 प्रतिशत रहने का अनुमान है। इसके अलावा 33 से 48 साल के Millennials करीब 35.7 करोड़, 49 से 64 साल के Gen-X लगभग 23.4 करोड़ और 65 से 83 साल के Baby Boomers की संख्या करीब 11.7 करोड़ हो सकती है।
भाजपा फर्स्ट-टाइम वोटर्स तक पहुंच बनाने पर खास जोर दे रही है। सोशल मीडिया पर मीम्स, इन्फोग्राफिक्स और छोटे वीडियो के जरिए संदेश, सीधे-सीधे डाले जा रहे हैं। साथ ही भारतीय जनता युवा मोर्चा के माध्यम से विश्वविद्यालयों और युवा समूहों के बीच भी पकड़ बढ़ाने की कोशिश हो रही है , ताकि युवाओं को पार्टी और सरकार की नीतियों से जोड़ा जा सके।
कांग्रेस रोजगार, भर्ती परीक्षाओं, पेपर लीक और युवाओं से जुड़े अन्य मुद्दों को अपनी रणनीति का मुख्य हिस्सा बना रही है। पार्टी युवा संवाद कार्यक्रमों और छात्र संगठनों के जरिए युवाओं के बीच अपनी मौजूदगी गहरी करने में लगी है। समाजवादी पार्टी सोशल मीडिया पर युवा चेहरों और तकनीकी विशेषज्ञों की मदद से रील्स और क्षेत्रीय भाषाओं में कंटेंट तैयार कर रही है। दूसरी तरफ तृणमूल कांग्रेस डिजिटल इन्फ्लुएंसर्स, गेमिंग कम्युनिटी और WhatsApp-Instagram नेटवर्क के ज़रिये युवाओं तक पहुंच बनाने की दिशा में काम कर रही है, एक तरह से चैनल-चैनल।
युवाओं का भरोसा जीतना सबसे बड़ी चुनौती मानी जा रही है। Gen-Z किसी भी दावे को बिना जांचे-परखे तुरंत “हाँ” नहीं कर देती , बल्कि अलग-अलग माध्यमों से जानकारी भी जुटाती है। इसलिए राजनीतिक दलों को अपने दावों के साथ काम का भरोसा भी दिखाना होगा। साथ ही सरल भाषा में संवाद, डिजिटल प्लेटफॉर्म पर असरदार मौजूदगी और युवाओं की भागीदारी बढ़ाना—ये सब जरूरी बनता जा रहा है। रोजगार, शिक्षा, टेक्नोलॉजी और भविष्य से जुड़े अवसर इस वर्ग की प्राथमिकताओं में साफ दिखेंगे।
करीब 38 करोड़ संभावित Gen-Z वोटरों की मौजूदगी किसी भी राजनीतिक दल के लिए नजरअंदाज जैसी नहीं होगी। आने वाले चुनाव में रैलियों के साथ डिजिटल कैंपेन, भाषणों के साथ पॉडकास्ट और पोस्टरों के साथ रील्स भी प्रचार का अहम हिस्सा बन सकते हैं। लेकिन अंत में युवा वोटर उसी पार्टी को प्राथमिकता देगा, जो रोजगार, शिक्षा, परीक्षा और भविष्य से जुड़े सवालों पर सबसे ठोस और भरोसेमंद जवाब दे पाएगी… बस, यही निर्णायक रहेगा।
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