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नए H-1B वीजा प्रस्ताव का गहन विश्लेषण: अमेरिकी गृह सुरक्षा विभाग ने 1,03,265 डॉलर की फीस का प्रस्ताव देकर विदेशी प्रतिभाओं पर अप्रत्यक्ष प्रतिबंध लगाया है। हमारी पड़ताल में समझिए 70% भारतीय हिस्सेदारी और 30 दिन की डेडलाइन का पूरा गणित।
अमेरिकी गृह सुरक्षा विभाग (DHS) द्वारा नए H-1B वीजा के लिए प्रस्तावित 1,03,265 डॉलर (लगभग 99 लाख रुपये) की भारी-भरकम फीस का यदि विश्लेषणात्मक अध्ययन किया जाए, तो यह केवल एक प्रशासनिक शुल्क वृद्धि नहीं बल्कि विदेशी कुशल कामगारों के प्रवेश को रोकने का एक सोची-समझी आर्थिक रुकावट है। इस नियम का सबसे बड़ा असर उन अमेरिकी नियोक्ताओं पर पड़ेगा जो भारत जैसे देशों से टेक प्रोफेशनल्स को स्पॉन्सर करते हैं। हमारी पड़ताल बताती है कि यह नीति अमेरिकी आईटी सेक्टर की हायरिंग प्राथमिकताओं को पूरी तरह बदलने के लिए लाई गई है।
डेटा का विश्लेषण बताता है कि 1,03,265 डॉलर (करीब 98.86 लाख रुपये) की यह अतिरिक्त फीस असल में एक ऐसा वित्तीय अवरोध है जो अमेरिकी कंपनियों को विदेशी कर्मचारियों को बुलाने से हतोत्साहित करेगा। टेक, इंजीनियरिंग और कोर रिसर्च जैसे क्षेत्रों में काम करने वाली बहुराष्ट्रीय कंपनियों के लिए अब विदेशी कर्मचारियों की हायरिंग कॉस्ट कई गुना बढ़ जाएगी, जिससे कंपनियों को स्थानीय अमेरिकी नागरिकों को ही प्राथमिकता देनी पड़ेगी।
सांख्यिकीय विश्लेषण से यह साफ उजागर होता है कि इस नीतिगत बदलाव का सबसे ज्यादा नुकसान भारत को ही होने वाला है। वित्त वर्ष 2025 के आधिकारिक सरकारी आंकड़ों के अनुसार, कुल H-1B वर्कफोर्स में 70 प्रतिशत भागीदारी भारतीय नागरिकों की रही है, जबकि चीन मात्र 12 प्रतिशत के साथ दूसरे स्थान पर था। इतनी बड़ी फीस लगने के बाद अमेरिकी कंपनियों के लिए भारतीय प्रोफेशनल्स को भारत से सीधे अमेरिका बुलाना आर्थिक रूप से बेहद नुकसानदेह साबित होगा।
दस्तावेजों की पड़ताल से पता चलता है कि यह नया नियम सभी पर एक समान रूप से लागू नहीं किया जा रहा है। जो विदेशी छात्र पहले से F-1 स्टूडेंट वीजा पर अमेरिका में मौजूद हैं और अपनी डिग्री पूरी कर चुके हैं, उन्हें H-1B में बदलते समय इस भारी फीस से छूट दी जाएगी। इसी तरह मौजूदा वीजा के रिन्यूवल पर भी यह शुल्क नहीं लगेगा। यह ढांचा स्पष्ट करता है कि अमेरिका अपने घरेलू विश्वविद्यालयों से पढ़े छात्रों को प्राथमिकता देना चाहता है, न कि सीधे विदेश से आने वालों को।
इस पूरे मामले की कानूनी पृष्ठभूमि की जांच करने पर सामने आता है कि पूर्व में भी ट्रंप प्रशासन ने 1 लाख डॉलर की फीस थोपने का प्रयास किया था, जिसे अमेरिकी संघीय अदालत ने रोक दिया था और वह विवाद आज भी जारी है। इसी कानूनी झटके से बचने के लिए अब सरकार ने नए प्रस्ताव पर 30 दिनों का पब्लिक कंसल्टेशन समय रखा है। जहां ऐतिहासिक रूप से H-1B वीजा की कुल फीस 2,000 से 5,000 डॉलर के बीच हुआ करती थी, वहीं अब 99 लाख की यह नई दर अंतरराष्ट्रीय श्रम बाजार में बड़ा व्यवधान पैदा करेगी।
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