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14 अगस्त को पाकिस्तान के पीएम शहबाज शरीफ द्वारा सिंधु जल संधि को 'रेड लाइन' बताने के पीछे उनके आंतरिक संकट (बलूचिस्तान में ब्लैक डे, स्वात में ब्लास्ट, PoJK में JAAC का प्रदर्शन और इमरान खान का जेल में होना) को छिपाने की रणनीति है। भारत ने पहलगाम हमले (26 मौतें) के बाद से कड़ा रुख अपनाया है।
पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने 14 अगस्त से ठीक पहले इस्लामाबाद में सिंधु जल संधि को अपनी “रेड लाइन” बता कर भारत को खुली-सी चेतावनी दे डाली। उन्होंने ये भी कहा कि पानी की हर बूंद अहम है, और फिर भारत को शांति का दुश्मन तक करार दे दिया। लेकिन अगर हम थोड़ा और सोचें तो ये सवाल चुभता है कि आखिर पाकिस्तान अचानक पानी वाले मुद्दे पर इतना मुखर क्यों हो रहा है? क्या ये भारत को डराने वाली कूटनीति है, या फिर अपने ही देश में अंदरूनी सुलग रही बगावत के धुएं पर परदा डालने वाली, एक सोची समझी चाल?
भारत की कूटनीतिक लाइन को देखें तो नई दिल्ली का स्टैंड बहुत साफ़ दिखता है। 22 अप्रैल 2025 को पहलगाम में हुए आतंकी हमले के बाद (जिसमें 26 लोग मारे गए), भारत ने अपनी जल नीति को सुरक्षा के साथ जोड़ दिया। 23 अप्रैल को सुरक्षा मामलों की कैबिनेट समिति की बैठक में यह तय हुआ कि 1960 की संधि अब “प्रासंगिक” नहीं रही। भारत की शर्त भी साफ है: जब तक पाकिस्तान सीमा पार आतंकवाद पर ठोस और विश्वसनीय कार्रवाई नहीं करता, तब तक पानी के मामले में कोई रियायत नहीं।
शहबाज शरीफ के इस बयान के पीछे मूल कारण उनकी आंतरिक सुरक्षा वाली समस्या बताई जा रही है। 14 अगस्त को बलूच राष्ट्रवादियों ने स्वतंत्रता दिवस को ‘ब्लैक डे’ की तरह मनाने का एलान किया, काले झंडे फहराने , और काली पट्टी बांधकर सरकारी कार्यक्रमों से दूरी रखने की बात कही। 12 अगस्त के संदर्भ में देखें तो सेना ने बलूचिस्तान में 10 आतंकवादियों को मारने का दावा किया , लेकिन सुराब में समय से पहले फटे कार बम में 3 नागरिक और 8 हथियारबंद लोग मारे गए। खैबर पख्तूनख्वा के स्वात क्षेत्र में (काबल पुलिस स्टेशन) 2 अगस्त को हुआ आत्मघाती हमला, 17 मौतें और 34 घायलों की बात साबित करता है कि पाकिस्तान की खुफिया व्यवस्था पूरी तरह से लड़खड़ा चुकी है।
दूसरा कारण यह है कि पाकिस्तान का राजनीतिक संकट लगातार गहराता जा रहा है। पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान जेल में हैं और उनकी पार्टी पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ (PTI) सरकार के खिलाफ राजनीतिक स्तर पर टकराव जारी रखे हुए है। इस असंतोष का असर पाकिस्तान के कब्जे वाले जम्मू-कश्मीर (PoJK) में साफ दिखता है। Joint Awami Action Committee (JAAC) के नेतृत्व में राजनीतिक अधिकारों को लेकर जो हिंसा भड़की, उसने सरकार को लगभग घुटने टेकने की स्थिति में ला दिया। महीने के अंत में हुई हिंसक झड़पों की वजह से इंटरनेट बंद करना पड़ा, और अगस्त में चुनाव के अंतिम चरण को सुरक्षा कारणों से टालना पड़ा। JAAC और PTI ने चुनाव का बहिष्कार भी किया।
कुल मिलाकर, गहराई से देखें तो यह बात उभरती है कि शहबाज शरीफ का भारत को चेताने वाला यह संदेश, शायद असल मुद्दे से ध्यान हटाने का एक तरीका है। जब बलूचिस्तान में आग जैसी स्थिति हो, स्वात में पुलिस पर आत्मघाती हमले हो रहे हों, PoJK में जनता अधिकारों के लिए सड़कों पर उतर रही हो, और इमरान खान की गिरफ्तारी से सरकार की पकड़ कमजोर पड़ रही हो, तब “वाटर कार्ड” खेलकर शरीफ अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सहानुभूति जुटाने और घरेलू जनता का फोकस कहीं और घुमाने की कोशिश कर सकते हैं।
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