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सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के उस फैसले को रद्द कर दिया है जिसमें बुजुर्गों को परेशान करने वाले बेटे-बहू की बेदखली रोक दी गई थी। हमारी रिपोर्ट में पढ़ें कैसे जस्टिस आलोक आराधे की बेंच ने अनुच्छेद 21 का हवाला देकर न्याय दिया।
वरिष्ठ नागरिकों के संपत्ति और सुरक्षा अधिकारों पर सुप्रीम कोर्ट ने एक बेहद महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। लेकिन हमारी पड़ताल का मुख्य विषय यह है कि आखिर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने किस आधार पर बेदखली का आदेश रद्द किया था और क्यों सुप्रीम कोर्ट को उस फैसले को पलटना पड़ा? इस कानूनी विश्लेषण के केंद्र में लखनऊ के विकास नगर इलाके का एक मकान और 81 वर्षीय एक बुजुर्ग महिला है, जिसे उसके ही पोते और बहू ने घर से बाहर कर वृद्धाश्रम जाने पर मजबूर कर दिया था।
इस मामले की जब जमीनी जांच (इन्वेस्टिगेशन) हुई, तो यह बात सामने आई कि मकान के असली मालिक रवि कांत गुप्ता हैं। उन्होंने शिकायत की थी कि उनका बेटा और बहू उनकी 81 वर्षीय मां को परेशान कर रहे हैं। कानूनी प्रक्रिया के तहत स्थानीय एसडीएम और जिला मजिस्ट्रेट (DM) ने जांच में पाया कि यह मकान रवि कांत गुप्ता की अपनी 'स्व-अर्जित संपत्ति' है। इसी जांच रिपोर्ट के आधार पर डीएम ने बेटे-बहू को बेदखल करने का सही आदेश दिया था।
विश्लेषण का अगला पड़ाव इलाहाबाद हाईकोर्ट का वह आदेश है, जिसमें बेटे-बहू ने अपील की थी। हाईकोर्ट ने तकनीकी आधार पर एसडीएम और डीएम के बेदखली आदेश को निरस्त कर दिया था। लेकिन जब यह मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा, तो जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस आलोक आराधे की पीठ ने इस पूरे मामले की गहरी कानूनी समीक्षा की। उन्होंने पाया कि हाईकोर्ट का फैसला वरिष्ठ नागरिकों की सुरक्षा के मूल उद्देश्य के खिलाफ था।
सुप्रीम कोर्ट ने अपनी जांच रिपोर्ट में स्पष्ट किया कि ट्रिब्यूनल के पास बुजुर्गों की रक्षा के लिए पर्याप्त अधिकार हैं। जजों ने भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 (जीवन का अधिकार) और अनुच्छेद 41 का गहरा विश्लेषण करते हुए बताया कि इन अनुच्छेदों के तहत बुजुर्गों का सम्मानजनक जीवन सुरक्षित करना राज्य का कर्तव्य है। सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट का फैसला रद्द करते हुए यह नजीर पेश की है कि अगर बुजुर्गों को घर में उपेक्षा या असुरक्षा झेलनी पड़े, तो ट्रिब्यूनल बिना किसी झिझक के रिश्तेदारों को संपत्ति से बेदखल कर सकता है।
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