भोपाल के गौपालक सम्मेलन में अमित शाह द्वारा की गई घोषणाओं का गहरा विश्लेषण। 2029 की नशामुक्ति डेडलाइन और 255 करोड़ के डेयरी प्रोजेक्ट के पीछे का पूरा खाका।

भोपाल के भेल दशहरा मैदान में शनिवार को संपन्न हुए राज्य स्तरीय गौपालक सम्मेलन का अगर बारीक विश्लेषण किया जाए, तो सबसे बड़ा रणनीतिक पहलू 31 दिसंबर 2029 तक मध्य प्रदेश को पूरी तरह नशामुक्त करने का ऐलान है। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव की मौजूदगी में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह द्वारा तय की गई यह समयसीमा केवल एक प्रशासनिक बयान नहीं है, बल्कि इसके पीछे सामाजिक सुधार और सख्त पुलिसिंग का एक लंबा रोडमैप नजर आता है। इस सम्मेलन का पूरा ध्यान पशुपालन, दूध उत्पादन बढ़ाने, डेयरी सहकारिता के नेटवर्क को मजबूत करने और नशे के खिलाफ चौतरफा जंग छेड़ने पर टिका था।
प्रोजेक्ट्स के वित्तीय पहलुओं की पड़ताल करें तो उज्जैन में 255 करोड़ रुपये की लागत से बनने वाला मिल्क प्रोसेसिंग प्लांट मालवा अंचल के दुग्ध कारोबार की दिशा बदल सकता है। शुरुआती दौर में 3 लाख लीटर प्रतिदिन की प्रोसेसिंग क्षमता का सीधा मतलब है कि स्थानीय उत्पादकों का सरप्लस दूध सीधे सरकारी चैनल में आएगा। इससे वैल्यू-एडेड प्रोडक्ट्स बनेंगे और बिचौलियों का मुनाफा खत्म होकर सीधा किसानों की जेब में जाएगा। योजना के ड्राफ्ट में इस प्लांट की क्षमता को आगे बढ़ाने का प्रावधान भी रखा गया है।
तकनीकी ढांचे की बात करें तो भोपाल में 12.42 करोड़ रुपये की लागत से तैयार राज्य स्तरीय केंद्रीय डेयरी प्रयोगशाला खाद्य मिलावट पर नकेल कसने का सबसे बड़ा हथियार बनेगी। इसके साथ ही भोपाल में 40 हजार लीटर प्रतिदिन क्षमता का प्रोडक्ट प्लांट और शिवपुरी के मिनी प्लांट का सुदृढ़ीकरण यह साबित करता है कि सरकार क्लस्टर आधारित डेयरी मॉडल पर काम कर रही है। गोशालाओं के लिए 101 करोड़ रुपये का आवंटन बताता है कि लावारिस गोवंश प्रबंधन को अब औपचारिक फंडिंग से जोड़ा जा रहा है।
अमित शाह के भाषण का सबसे दिलचस्प हिस्सा दूध उत्पादन के आंकड़ों की तुलना थी। उन्होंने सीधे तौर पर कांग्रेस पर वार करते हुए कहा कि विपक्ष सिर्फ विरोध करता है और मैं उन्हें हिसाब देने आया हूं। आंकड़ों के मुताबिक, 1947 से लेकर 75 सालों में देश का कुल दूध उत्पादन सिर्फ 14 करोड़ 7 लाख टन तक पहुंचा था, जबकि 2014 से 2024 के 10 वर्षों में मोदी सरकार के दौरान यह उछलकर 25 करोड़ टन हो गया। यह तेज वृद्धि पशु स्वास्थ्य और डेयरी योजनाओं में केंद्र व राज्य सरकारों की सक्रियता को दर्शाती है।
सम्मेलन में भोपाल और इंदौर दुग्ध संघ के पशुपालकों को बोनस वितरण तथा गोशालाओं और डेयरी समितियों के सदस्यों को दिए गए लाभ का आर्थिक असर सीधा ग्रामीण लिक्विडिटी पर पड़ेगा। गौपालक दीदियों का सम्मान महिला सशक्तिकरण को रेखांकित करता है। वहीं, गोबर से कमाई की व्यवस्था बनाने की घोषणा असल में ग्रामीण स्तर पर बायो-इकोनॉमी तैयार करने की दिशा में उठाया गया कदम है, ताकि पशु केवल दूध देने तक ही किसान के लिए उपयोगी न रहे, बल्कि गोबर से भी स्थायी आय हो सके।
पशुपालन क्षेत्र की सबसे बड़ी समस्या कम उत्पादकता वाली नस्लें रही हैं। शाह द्वारा सीएम मोहन यादव से 50 एकड़ जमीन लेने की सहमति जताना असल में बड़े पैमाने पर जेनेटिक और नस्ल सुधार का संकेत है। इस जमीन पर गोवंश और भैंस की नस्ल सुधार के केंद्र स्थापित होंगे। पूरे विश्लेषण से यह बात साफ निकलती है कि सरकार श्वेत क्रांति के जरिए ग्रामीण जीडीपी को बढ़ाना चाहती है और युवाओं को नशे से दूर रखकर कार्यबल को मजबूत करने की दोहरी रणनीति पर काम कर रही है।